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World News: आज से ठीक 112 साल पहले, 12 दिसंबर 1911 को, ब्रिटिश सम्राट जॉर्ज पंचम ने भारत की राजधानी कलकत्ता (अब कोलकाता) से दिल्ली स्थानांतरित करने की घोषणा की थी। यह केवल एक प्रशासनिक फैसला नहीं था, बल्कि ब्रिटिश साम्राज्य का एक गहरा राजनीतिक दांव था, जिसे ‘दास्तान ए दिल्ली’ किताब के लेखक आदित्य अवस्थी के अनुसार, एक अति-गोपनीय कोडनेम ‘सीसेम प्रोजेक्ट’ के तहत अंजाम दिया गया था।
ब्रिटिश राज को डर था कि अगर राजधानी बदलने की खबर कलकत्ता के प्रभावशाली लोगों और व्यापारियों को पहले ही पता चल गई, तो वे बड़ा विद्रोह खड़ा कर सकते थे। इसीलिए, किंग जॉर्ज पंचम समेत केवल 20-25 लोगों को ही इस बदलाव की भनक थी। इतिहासकार इसे ‘बेस्ट केप्ट सीक्रेट ऑफ इंडिया’ बताते हैं। यहाँ तक कि तत्कालीन वायसराय लॉर्ड हार्डिंग को भी इसका आधिकारिक पता नहीं था।
12 दिसंबर 1911 को दिल्ली दरबार में, किंग जॉर्ज पंचम ने 80 हजार से अधिक की भीड़ के सामने यह सामान्य दावा किया कि सरकार राजधानी कलकत्ता से दिल्ली स्थानांतरित करने के लिए कटिबद्ध है। आधिकारिक घोषणा 20 मार्च 1912 को हुई।
विद्रोह से डर और प्रशासनिक सुविधा: ये थे दो बड़े कारण
राजधानी स्थानांतरित करने का मुख्य कारण 1905 में लॉर्ड कर्जन द्वारा किए गए बंगाल विभाजन के बाद देश में अंग्रेजों के खिलाफ शुरू हुआ विद्रोह था। कलकत्ता, जो उस समय राष्ट्रवादी भावनाओं का गढ़ बन चुका था, में स्वदेशी आंदोलन अपने चरम पर था, जिससे अंग्रेजों के लिए वहाँ से शासन चलाना मुश्किल हो गया था। ब्रिटिशों ने प्रशासनिक केंद्रों को अलग-थलग करने के लिए कलकत्ता से छुटकारा पाना चाहा।
दिल्ली को नई राजधानी बनाने का दूसरा और मुख्य कारण इसकी भौगोलिक लोकेशन थी। कलकत्ता देश के पूर्वी किनारे पर था, जिससे शासन चलाना कठिन होता था। दिल्ली देश के बीचोंबीच थी, जिसका रेल और सड़क मार्ग से जुड़ाव बेहतर था। यह स्थान सदियों से भारत की राजधानी रही थी और इसकी ऐतिहासिक भव्यता इसे और मुफीद बनाती थी।
राजधानी की घोषणा के बाद, ब्रिटिश आर्किटेक्ट्स सर एडविन लुटियंस और सर हर्बर्ट बेकर को नई दिल्ली के निर्माण की जिम्मेदारी सौंपी गई। उन्होंने रायसीना की पहाड़ी पर वायसराय हाउस (आज का राष्ट्रपति भवन) के साथ राजपथ, नॉर्थ-साउथ ब्लॉक और संसद भवन की रूपरेखा तैयार की। 1927 में इसका नाम ‘नई दिल्ली’ रखा गया और 1931 में यह आधिकारिक रूप से भारत की राजधानी बन गई।

